Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 32,33
संस्कृत श्लोक
परमाणोरपि परं तदणीयो ह्यणीयसः ।
शुद्धं सूक्ष्मं परं शान्तं तदाकाशोदरादपि ॥ ३२ ॥
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नरूपत्वादतिविस्तृतम् ।
तदनाद्यन्तमाभासं भासनीयविवर्जितम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जीव अणुपरिमाण या मध्यमपरिमाण है, पुण्य- पाप आदि से दूषित होने के कारण अशुचि
है ओर कमनुसार प्राप्त विषयों का भोक्ता है, परन्तु ब्रह्म उससे सर्वथा विपरीत है, अतः वह
जीव कैसे हो सकता है, ऐसा कहते हैँ ।
वह परमाणु से भी अधिक सूक्ष्म, अत्यन्त सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अत्यन्त शुद्ध अत्यन्त शान्त
ओर आकाश के मध्य से भी बढ़ कर निर्मल हे । देश, काल ओर परिमाण से उसके स्वरूपका
५ आगे कही जानेवाली सात भूमिकाओं में से प्रथम से ले कर पाँचवी भूमिका तक पहुँचे हुए
योगियों का जगत् सुषुप्त है तथा छदी और सातवीं भूमिका में पहुँचे हुओं का विश्व तुर्य है ।
परिच्छेद नहीं हो सकता, अतएव वह अत्यन्त विस्तृत (सर्वव्यापक) है उसका न आदि है, न
मध्य है और न अन्त है और वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है एवं उसका भासक भी कोई नहीं है, वह
स्वप्रकाश है