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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verses 29–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verses 29–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 29-31

संस्कृत श्लोक

पूर्णात्पूर्णं प्रसरति संस्थितं पूर्णमेव तत् । अतो विश्वमनुत्पन्नं यच्चोत्पन्नं तदेव तत् ॥ २९ ॥ चेत्यासंभवतस्तस्मिन्यदेका जगदर्थता । आस्वादका संभवतो मरीचे कैव तीक्ष्णता ॥ ३० ॥ सत्येवेयमसत्यैव चित्तचेत्यादिता परे । तद्भावात्प्रतिबिम्बस्य प्रतिबिम्बार्हता कुतः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

शंका : यदि वह पूर्ण है, तो जीवरूप से क्यो प्रतीत होता है ? समाधान : जो वह विश्वरूप से प्रतीत होता है, वह उसने अपने स्वरूप लाभरूप प्रयोजन की सिद्धि के लिए दिखलाया हे । क्रमशः अधिकारी के शरीर की प्राप्ति से अपने तत्त्व के साक्षात्कार द्वारा अज्ञानसे तिरोहित अपने स्वरूप के लाभ के लिये वह जीवभावसे प्रतीत होता है, यह भाव हे । पूर्ण से पूर्ण ही आविर्भूत होता है, पूर्ण में स्थित वह पूर्ण ही है, अतः विश्व उत्पन्न ही नहीं हुआ और जो उत्पन्न हुआ है वह तत्स्वरूप ब्रह्म ही हे । चेत्य का (दृश्य का) संभव न होने से उस चिद्घन आनन्द में जगत्‌शब्दार्थता ("जगत्‌ शब्द का अर्थ) एकरस हो गई, पृथक्‌ नहीं रही, जब आस्वाद लेनेवाला ही नहीं है, तब मिर्चे में कडुवेपन की क्या संभावना ? अर्थात्‌ वह नहीं के बराबर है । दृश्य प्रपंच के ब्रह्म मेँ एकरस होने के कारण ही ब्रह्म में चित्ता, चेत्यता आदि सर्वथा असत्य होते हुए भी सत्य-से प्रतीत होते हैँ । इस प्रकार उपाधिका अभाव होने पर प्रतिबिम्बभूत जीव की प्रतिबिम्बयोग्यता कहाँ जब उपाधि हो ओर उसमें प्रतिबिम्ब पड़े तब प्रतिबिम्बभूत जीवभाव की सत्ता हो, उपाधि ही जब नहीं हे, तब प्रतिविम्बभूत जीवभावता ब्रह्म में कहाँ अतः वह जीव भी नहीं हे, यह कथन उचित ही हे । इससे “जीवो वा न कर्थं भवेत्‌“ इस शंका का निराकरण हआ