Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verses 37–42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verses 37–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 37-42
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
परमार्थस्य किं रूपं तस्यानन्तचिदाकृतेः ।
पुनरेतन्ममाचक्ष्व निपुणं बोधवृद्धये ॥ ३७ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
महाप्रलयसंपत्तौ सर्वकारणकारणम् ।
शिष्यते परमं ब्रह्म तदिदं वर्ण्यते श्रृणु ॥ ३८ ॥
नाशयित्वा स्वमात्मानं मनसो वृत्तिसंक्षये ।
सद्रूपं यदनाख्येयं तद्रूपं तस्य वस्तुनः ॥ ३९ ॥
नास्ति दृश्यं जगद्द्रष्टा दृश्याभावाद्विलीनवत् ।
भातीति भासनं यत्स्यात्तद्रूपं तस्य वस्तुनः ॥ ४० ॥
चितेर्जीवस्वभावाया यदचेत्योन्मुखं वपुः ।
चिन्मात्रं विमलं शान्तं तद्रूपं परमात्मनः ॥ ४१ ॥
अङ्गलग्नेऽपि वातादौ स्पर्शाद्यनुभवं विना ।
जीवतश्चेतसो रूपं यत्तद्वै परमात्मनः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार प्रश्नो का समाधान होने पर शंकाशून्य चित्त मे जिस रूप से उसका अपरोक्ष
ज्ञान हो सके, उस असाधारण रूपको पहिचानने के लिए श्रीरामचन्द्रजी फिर पूछते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, अनन्त चिदाकार उस परमार्थततत्वका कैसा रूप है ?
भलीभाँति उसका बोध प्राप्त होने के लिए उसको मुझसे फिर कहिए । श्रीवसिष्ठजी ने कहा :
वत्स, महाप्रलय होने पर सम्पूर्ण कारणों का भी कारण अपरोक्ष परमब्रह्म अवशिष्ट रहता है,
उसका में वर्णन करता हूँ, आप सुनिए, समाधि में मन का विषयों से निरोध द्वारा वृत्ति का क्षय
होने पर लकड़ियों के समाप्त होने पर अग्नि की नाई मन के स्वरूप का भी नाश करके जो
नाम-रूप-शून्य स्वप्रकाश सद्रूप अवशिष्ट रहता है, वही उस परमार्थ वस्तु का रूप हे ।
निर्विकल्प समाधि के आरम्भ में दृश्य जगत की सत्ता नहीं रहती, दृश्य के अभाव से द्रष्टा भी
विलीन हुए की नाई प्रतीत होता है, यों ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान इस त्रिपुटी के लय का साक्षीरूप
जो ज्ञान अवशिष्ट रहता है, वही उस परमार्थ वस्तु का रूप हे । समाधि-व्युत्थान होने के
पहले जो आगे जीव -स्वरूप होनेवाली है, उस चितिका अचेत्योन्मुख (चिन्मात्र में प्रवण) जो
चिन्मात्र, निर्मल और निर्विकाररूप है, वह उस परमात्मा का रूप है । शरीरमें वायु आदि का
स्पर्श होने पर भी चित्त के रहते-रहते अर्थात् दूधमें मिले हुए जलके समान ब्रह्म मेँ एकरस
होने के कारण तिरोभूत चित्त को कुछ न गिनकर स्पर्श आदि के अनुभव के बिना प्रतीत
होनेवाला जो रूप है, वही उस परमात्मा का रूप हे