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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verses 15–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 100, verses 15–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

यन्मनाड्मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते । पिच्छभ्रान्तिर्यथा व्योम्नि पयस्यावर्तधीर्यथा ॥ १५ ॥ प्रतिभासकलामात्रं मनो जीवस्तथात्मनि । यदेतन्मनसो रूपमुदितं मननात्मकम् ॥ १६ ॥ ब्राह्मी शक्तिरसौ तस्माद्ब्रह्मैव तदरिंदम । इदं तदहमित्येव विभागः प्रतिभासजः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म ही तत्‌-तत्‌ शक्तियों से भ्रान्तिवश मन आदि शब्दों से पुकारा जाता है, वह ब्रह्म से अतिरिक्त नहीं है, ऐसा कहते है । वह जब तनिक मननशक्तिको धारण करता है, तब मन कहलाता हे । जैसे आकाशमें भ्रमवश मोर के पंखों की प्रतीति होती है ओर जलमें आवर्तवुद्धि होती है, वैसे ही ब्रह्म में मनकी प्रतीति होती है । आत्मा में जीव और मन यह केवल प्रतीतिमात्र ही है, वास्तविक नहीं है जो यह मनका मननात्मक रूप उदित हुआ है, वह ब्राह्मी शक्ति ही है इसलिए हे रिपुसूदन, वह ब्रह्म ही है, उससे अतिरिक्त नहीं हे । शक्ति ओर शक्तिके कार्य में अभेद है, अतः "इदम्‌" (यह) यों सामने स्थितरूप से, "तत्‌" (वह) यों परोक्षरूपसे ओर “अहम्‌” (मैं) यों प्रत्यगात्मा के अभेद से प्रतीत हो रहा तीन प्रकार का जो दुश्यविभाग है, वह प्रातिभासिक ही है, वास्तविक नहीं हे