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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 100, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

मनसो ब्रह्मणोऽन्यच्च मोहे परमकारणम् । यद्यच्चैतन्मनस्येव किंचित्सदसदात्मकम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि काम, कर्मवासना आदि भी द्वैतप्रपच के हेतु घुने जाते हैं, ऐसी अवस्थे ब्रह्मथक्ति ही प्रपंचकी हेतु है, यह कैसे कहा ? इस पर कहते हैं। मन के यानी जीव के ओर ब्रह्म के भेद आदि भ्रममें अन्यान्य काम आदि जो कुछ भी परम कारण लोक में कहे गये हे, मन में ही आविर्भाव ओर तिरोभाव होने के कारण सदसदात्मक उन सबको विज्ञ पुरुष सर्वशक्तिशाली ब्रह्म की पूर्वोक्त ब्रह्मता (बृहणशक्ति) ही जानते हैं, वे उससे अतिरिक्त नहीं हे