Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 100, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
यथर्तोः शक्तयस्तद्वज्जीवेहा ब्रह्मणि स्थिताः ।
व्याप्तसर्वर्तुकुसुमा क्ष्मादेशविधिभेदतः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि सभी मनोधर्म ब्रह्मथक्तियाँ हैं, तो सबका सब जीवों में संमिश्रण क्यो नहीं होता ?
इस पर कहते हैं।
यद्यपि पृथिवी में सब ऋतुओं के फूलों की शक्ति व्याप्त है तथापि वह जैसे तत्-तत्
प्रदेशों के बीजों के संस्कार आदिके नियमभेद से तत्-तत् कालमें व्यवस्था के साथ ही फूल
आदि को धारण करती है, सबको एक साथ धारण नहीं करती, वैसे ही लोकों की सृष्टि
करनेवाले ब्रह्म भी चित्त की शक्तियों को व्यवस्थासे ही धारण करते हैं; सबको सांकर्य
(संकरता) से धारण नहीं करते हँ