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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verses 17–19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 101, verses 17–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 17-19

संस्कृत श्लोक

परिशुष्का भृशं यासौ तस्यां ते सस्नुरादृताः । घर्मार्ता इव गङ्गायां ब्रह्मविष्णुहरा इव ॥ १७ ॥ चिरं कृत्वा जलक्रीडां पीत्वा क्षीरोपमं पयः । जग्मुस्ते राजतनयाः प्रहृष्टमनसः स्वयम् ॥ १८ ॥ अथासेदुर्दिनस्यान्ते लम्बमाने दिवाकरे । भविष्यन्नवनिर्माणं नगरं नगसन्निभम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

जो नदी अत्यन्त सूखी थी, उसमें उन्होने सूर्य की धूप से पीडित लोगों की तरह बड़े प्रेम से एसे स्नान किया जैसे कि गंगाजी में ब्रह्मा, विष्णु ओर महेश स्नान करते हैँ । इच्छित नगर की प्राप्ति के लिए उत्सुक वे राजपुत्र चिरकाल तक जलक्रीडा कर, दूध के तुल्य स्वच्छ जल पीकर वहाँसे चले | तदुपरान्त सायंकाल के समय जब कि सूर्य भगवान्‌ अस्ताचल पर लटक रहे थे तब उन्हें पर्वत के तुल्य ऊँचा नगर मिला जिसकी अभिनव रचना आगे होनेवाली थी