Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 101, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
द्यौः क्षमा वायुराकाशं पर्वताः सरितो दिशः ।
संकल्पकचितं सर्वमेवं स्वप्नवदात्मनः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
किच, यह द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश,
पर्वत, नदियाँ, दिशाएँ आदि सभी आत्मा के स्वप्न के समान संकल्पमय चित्त के संकल्प
से विकसित (स्फुरित) हैं