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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verse 37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 101, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

संकल्पमात्रमभितः परिस्फुरति चञ्चलः । पयोमात्रात्मकोऽम्भोधिरम्भसीवात्मनात्मनि ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

एकमात्र जलस्वरूप चंचल समुद्र अपने स्वरूपभूत जल में अपने आप स्फुरित होता है वैसे ही एकमात्र संकल्प ही चारों ओर स्फुरित हो रहा है