Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 101, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
संकल्पजालकलनैव जगत्समग्रं संकल्पमेव ननु विद्धि विलासचेत्यम् ।
संकल्पमात्रमलमुत्सृज निर्विकल्पमाश्रित्य निश्चयमवाप्नुहि राम शान्तिम् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल संकल्प के त्यागमात्र से निर्विकल्प स्वरूप मे स्थिति होती है, ऐसा दर्शीते हुए
उपसंहार करते है ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, संकल्प रूपीजालों की रचना ही सम्पूर्णं जगत हे । संकल्प को ही आप
राग आदि चित्तवृत्तियाँ और समस्त विषय जानिये। आप एकमात्र संकल्पका पूर्णरूप से परित्याग
कर निर्विकल्प आत्मज्ञान का जो कि संकल्प के परित्यागका एकमात्र हेतु है, अवलम्बन कर
शान्ति को प्राप्त होइए