Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्वसंकल्पवशान्मूढो मोहमेति न पण्डितः ।
अक्षये क्षयसंकल्पान्मुह्यते शिशुरेव हि ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, जैसे बालक अपने संकल्प से ठूँठ आदि में वेताल
आदि की कल्पना कर भयभीत होता है वैसे ही अज्ञानी पुरुष अपने संकल्प से परमात्मा में
नश्वरात्मा के संकल्प से मोह को प्राप्त होता है, ज्ञानी पुरुष मोह को प्राप्त नहीं होता
सर्ग सन्दर्भ
लि एक सौ एकर्वौँ सर्ग समाप्त एक सौ दोवाँ सर्ग अहंकार और संकल्प के विनाश के उपाय का, अनात्मवर्ग के विवेक का तथा परमात्मा की नित्यता का निरूपण ।