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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verses 27–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verses 27–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

एषा हि मानसी शक्तिरिष्टानिष्टनिबन्धनी । अनयैव मुधा भ्रान्त्या स्वप्नवत्परिकल्पना ॥ २७ ॥ अविद्यैषा दुरन्तैषा दुःखायैषा विवर्धते । \\xa0अपरिज्ञायमानैषा तनोतीदमसन्मयम् ॥ २८ ॥ एषा तुच्छवदाकाशं तुषारमलिनं यथा । परिपश्यति विभ्रान्ता स्वरूपस्य स्वभावतः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

यह वासना इष्ट और अनिष्ट में अनुराग और द्वेष से अभिनिवेशरूप बन्धन करनेवाली मानसी शक्ति है। इसी ने व्यर्थ भ्रान्ति से स्वप्न के समान यह कल्पना की है। यह वासना अविद्याविलास होने से अविद्या है इसका अन्त होना बड़ा कठिन है, यह केवल दुःख के लिए ही बढती है । इसके स्वरूप का परिज्ञान न होने से ही यह असद्रूप इस प्रपंच का विस्तार करती है