Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
असता भूतसंघेन क्षयोऽहंकारनामधृक् ।
वेतालः शिशुनेवेह मिथ्यैव परिकल्पितः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
भाव यहहै कि क्या नित्य आत्मा नश्वर आत्मा का संकल्प करता है या नश्वर आत्मा ही नश्वर
आत्मा का संकल्प करता है 2 पहला पक्ष बन नहीं सकता, क्योकि नित्य आत्मा अपने स्वभाव
से विपरीत का संकल्प नहीं कर सकता है यानी वह नश्वर आत्मा का संकल्पयिता नहीं हो सकता ।
दूसरा पक्ष भी नहीं बन सकता, क्योकि उसमें आत्माश्रय दोष विद्यमान है। जब नश्वरात्मा उत्पन्न
हो जाय तब नश्वरात्मा का संकल्प करेगा ? ओर सुनिए, संकल्पित नश्वर आत्मा भी क्या जड़
है अथवा चेतन है ? पहला पक्ष हृदय अग नहीं होता, क्योकि यदि वह जड होगा, तो आत्मा के
साथ उसका अभेद नहीं हो सकेगा । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं जँचता, क्योकि यदि वह चिद्रूप
है, तो संकल्प का विषय नहीं हो सकेगा । यद् यद् भवन्ति तदा भवन्ति (पहले इस लोक में जो
जो हुए थे वही फिर यहाँ आकर होते है) इस श्रुति (& ) के अनुसार पूर्वजन्मो के सिह, बाघ
आदि प्राणि समुदायमें आत्मभाव की वासना से वासित असत्“ शब्दवाच्य अविद्या से उपहित
परमात्मा ने चित-अचित्-सम्मिश्रणात्मक सिंह व्याघ्र आदि में अहंकारात्मक नश्वर आत्मा का
संकल्प किया है, इसलिए जिन दोषों की आपने सम्भावना की हे, वे कोड भी नहीं हैं, इस आशय
से श्री वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न का समाधान करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, जैसे अज्ञ बालक मिथ्या वेताल की कल्पना
&. पूरी श्रुति इस प्रकार है-“त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतंगो वा
दंशो वा मशको वा यद् यद् भवन्ति तदा भवन्ति“ जो अपनी सद्रूपता का ज्ञान प्राप्त किये बिना ही
सत् में प्रविष्ट होते हैं वे इस लोक में जिन कर्मों से प्राप्त हुई व्याघ्र आदि जिस, जिस जाति को प्राप्त
हुए थे - मैं व्याप्र हूँ, मैं सिंह हूँ” इत्यादि रूप से स्थित थे- वे पूर्व कर्म, ज्ञान की वासना से युक्त
होकर सत् में प्रविष्ट होने पर भी उस भाव से ही फिर आकर होते हैं । पुनः सत् से आकर बाघ या
शेर या भेडिया या सुअर या कीड़ा या पतंगा अथवा डाँस या मच्छर जो लोक में पहले हुए थे वही
फिर आकर होते हैं । हजारों करोड़ों युग बीतने पर भी संसारी जीव की जो वासना पहले भावित थी,
वह नष्ट नहीं होती ।
करता है, वैसे ही सिंह, बाघ आदि प्राणियों में अहंभाव की वासना से वासित यानी पूर्वकल्प
में जीवभाव को प्राप्त हुए अहंकार के संस्कार से संस्कृत अविद्या से उपहित परमात्मा ने
तत्-तत् कल्प में मिथ्या अभिमान और मिथ्या नाम धारण करनेवाले नश्वर आत्मा की
कल्पना की है