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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

लयमस्याः स्वरूपं त्वं नय राम विचारणात् । यथा हिमशिलायास्तु तपनाद्दिवसाधिपः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव अविचारजनित द्वैत की भावनामात्र से सिद्ध जगत्‌ का विचारजन्य ज्ञानमात्रसे लय होता है, इसलिए विचार अवश्य करना चाहिए, ऐसा कहते है । हे श्रीरामन्द्रजी, जैसे सूर्य अपने ताप से बर्फ की चट्टान के स्वरूप को नष्ट कर देता हे वैसे ही आप विचार से इस मानसी शक्ति के स्वरूप को नष्ट कर दीजिए