Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verses 33–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verses 33–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
हिमाभावार्थिनोऽर्कस्य स्वोदयेनेप्सितं यथा ।
सिद्ध्यत्येवं विचारेण मनोनाशार्थिनोऽर्थितम् ॥ ३३ ॥
अविद्याऽसंप्रबुद्धा हि विततानर्थदुर्गमा ।
नानेन्द्रजालकलनां शम्बरो हेम वर्षति ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे शीत के
अभाव को चाहनेवाले सूर्य के अपने उदयमात्रसे शीत का नाश हो जाता है वैसे ही मन के नाश
की इच्छा करनेवाले पुरुष का केवल विचार से मनोनाश रूप अभिलाषा सिद्ध हो जाती है ॥