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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verses 38–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verses 38–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

स्वसंकल्पविकल्पांशं विवेकोपहितं मनः । संत्यज्य रूपमाभोगि करोत्यात्मावबोधनम् ॥ ३८ ॥ महोदयो मनोनाशो महोच्छेदस्य तूदयः । मनोनाशे प्रयत्नं त्वं कुरु मा मनसो जवे ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

विवेक से संस्कृत (शुद्ध) हुआ मन अपने पूर्वकालीन संकल्पविकल्प-अंश का परित्याग कर ब्रह्माकार विस्तारवाला आत्म-साक्षात्कार वृत्ति रूप अपना परिणाम करता हे हे श्रीरामचन्द्रजी, मन का विनाश होना परमपुरुषार्थ की प्राप्ति हे ओर सब दुःखों के समूल नाश का उदय है । इसलिए आप मन के नाश के लिए प्रयत्न कीजिये, मन के बाह्य व्यापार मेँ प्रयत्न मत कीजिये