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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

वस्तुतो नास्त्यहंकारः परमात्मन्यभेदिनि । असम्यग्दर्शनान्मार्गीसरित्तीव्रातपे यथा ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

भेदरहित परमात्मामें वास्तव में अहंकार है ही नहीं । जैसे भ्रान्तिवश तीव्र सूर्य के प्रकाश में मृगतृष्णा की प्रतीति होती है वेसे ही भ्रान्तिवश परमात्मा में अहंकार का भान होता हे