Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
मनोमणिमहारम्भः संसार इति लक्ष्यते ।
आत्मनात्मानमाश्रित्य स्फुरत्यन्तर्यथाम्भसा ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
मनरूपी चिन्तामणि की बड़ी भारी कार्यसमूहसृष्टि संसाररूप से देखी जाती हे ।
शंका - तो क्या मन ही संसार की रचना करने में स्वतन्त्रहै ?
समाधान : नहीं, आत्मा का आश्रय ले करके वह स्वयं संसाररूप में स्फुरित होता है जैसे
कि जलका अवलम्बन करके जल ही तरंग रूप से स्फुरित होता है