Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
धिया विचारधर्मिण्या मोहसंरम्भहीनया ।
विचारयाधुना सत्यमसत्यं संपरित्यज ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
असद्विषयक भ्रम के त्याग ओर सद्विषयक सम्यक् दर्शन के आश्रय के लिए कौन उत्तम
उपाय है, ऐसी जिज्ञासा होने पर कहते हैं ।
श्रीरामजी, आप विचाररूपी अपने धर्म से सम्पन्न और मोह के वेग से हीन बुद्धि से
सत्य तत्त्व का विचार कीजिये ओर असत्य का त्याग कीजिये