Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, Verses 13–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 103, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 103 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
मनोरथे तथा स्वप्ने संकल्पकलनासु च ।
गोष्पदं योजनव्यूहः स्वासु लीलासु चेतसः ॥ १३ ॥
कल्पं क्षणीकरोत्यन्तः क्षणं नयति कल्पताम् ।
मनस्तदायत्तमतो देशकालक्रमं विदुः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
मनोरथ में, स्वप्न मे ओर संकल्पकल्पनाओं मेँ अनेक योजन भूमि गोपद के समान अति अल्प
प्रतीत होती है, वैसे ही अपनी लीलाओं में चित्त कल्प को क्षण बना देता है ओर क्षण को कल्प
बना देता है, इसलिए सम्पूर्ण देश-कालक्रम को सभी लोग चित्त के अधीन मानते हें