Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 103, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 103 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
सकर्तृकर्मकरणं यदिदं चेत्यमागतम् ।
द्रष्टृदर्शनदृश्याढ्यं तत्सर्वं चित्तमेव च ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्ता, कर्म और
करण से युक्त द्रष्टा, दर्शन और दृश्य से सम्पन्न तथा भोक्ता, भोग्य ओर भोगरूप जो यह नौ
प्रकार का संसाररूपी अनर्थ प्राप्त हुआ है यह सब चित्त ही है