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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 103, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 103 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

चित्तं जगन्ति भुवनानि वनान्तराणि संलक्ष्यते स्वयमुपागतमात्मभेदैः । केयूरमौलिकटकैश्च लसत्स्वरूपं त्यक्त्वैव काञ्चनधियेव जनेन हेम ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

सव चित्त ही है, यह जिस उपाय से दिखलाई देता है, उसे दिखलाते हुए उपसंहार करते हैं । जैसे सुवर्ण परीक्षा करनेवाला पुरुष बाजूबन्द, मुकुट, कड़ा, हार आदि आभरणो से कल्पित नाना स्वरूप का त्याग कर एकमात्र काँचन में बुद्धि का प्रणिधान करने से सुवर्ण की परीक्षा करने पर वास्तव सुवर्ण को देख सकता है, बाजूबन्द आदि के रचनावैचित्र्यमें जिनकी बुद्धि फँसी है, वे वास्तविक सुवर्णतत्त्व को नहीं देख सकते, वैसे ही विवेकी पुरूष भी जगतों को तदन्तर्गत भुवनों को और उनके अन्तर्गत वन आदि सब वस्तुओं को आत्मभेदों से (स्ववैचित्रयों से) चित्त स्वयं प्राप्त हुआ है, अतः ये चित्तमात्र ही हैं, चित्त से अतिरिक्त वस्तु नहीं है, ऐसा देखते हैं, अविवेकी ऐसा नहीं देख पाते