Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 104, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अत्र ते श्रृणु वक्ष्यामि वृत्तान्तमिममुत्तमम् ।
जागतीहेन्द्रजालश्रीश्चित्तायत्ता यथा स्थिता ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरघुवंशमणे, यह जगद्रूप इन्द्रजाल जिस प्रकार चित्त के अधीन
है यानी चित्त की कल्पना के अधीन है, उसे समझाने के लिए यहाँ पर मैं आपसे एक उत्तम
उपाख्यान कहूँगा, आप सावधान होकर सुनिये
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ तीनवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौथा सर्ग लवणाख्यान में पहले देश, राजा और सभा का वर्णन तथा सभा में एेन्द्रजालिक के घोड़े का दर्शन और राजा के विस्मय का वर्णन |