Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 103, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 103 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
यदाप्तं स्वयमादत्ते यथैव चञ्चलं मनः ।
हस्तपादादिसंघातस्तदा प्रयतते तथा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
चंचल मन कर्म द्वारा उपस्थापित भोग्य पदार्थ को जब जैसे जिस
किसी कल्पना के ढंग से, चाहे वह अनुकूल हो चाहे प्रतिकूल हो, ग्रहण करता है तब हाथ, पैर
आदि कर्मेन्द्रियसंघ उसके अनुसार ही ग्रहण या त्याग में प्रवृत्त होता है यों सभी व्यवहारो में
मन की स्वतन्त्रता है, यह तात्पर्य हे