Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 21–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 104, verses 21–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 21-26
संस्कृत श्लोक
सुखोपविष्टे तत्रास्मिन्राजनीन्दाविवाम्बरे ।
प्रविशन्तीषु सामन्तसेनासु च ससंभ्रमम् ॥ २१ ॥
गायन्तीष्वथ कान्तासु सूपविष्टेषु राजसु ।
मनो हरति साह्लादे वीणावंशकलारवे ॥ २२ ॥
चारुचामरहस्तासु सविलासासु राजनि ।
देवासुरगुरुप्रख्ये विश्रान्ते मन्त्रिमण्डले ॥ २३ ॥
प्रस्तुतेषु प्रविष्टेषु राजकार्येषु मन्त्रिभिः ।
प्रोक्तासु देशवार्तासु निपुणैश्चारुमन्त्रिभिः ॥ २४ ॥
इतिह्यसमये पुण्ये वाच्यमाने च पुस्तके ।
पठत्सु च स्तुतीः पुण्याः पुरः प्रह्वेषु वन्दिषु ॥ २५ ॥
सभां विवेश साटोपः कश्चित्तामैन्द्रजालिकः ।
वर्षेणाहितसंरम्भो वसुधामिव वारिदः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चन्द्रमा आकाश में उदित होते हैं, वैसे ही जब
उक्त राजा सभागृह में सिंहासन पर विराजमान हो गया तब सामन्त राजाओं की सेनाएँ वेग के
साथ प्रविष्ट होने लगी, स्त्रियाँ गाने लगी, अन्यान्य राजा यथास्थान बैठ गये, आनन्ददायक
वीणा ओर बाँसुरी की मधुर ध्वनि मन को हरने लगी, सुन्दर चँवर हाथ में ली हुई स्त्रियाँ
विलासपूर्वक राजा के ऊपर चवर लाने लगी और शुक्र के समान प्रखरमति मन्त्रिमण्डल
यथास्थान बैठ गया, जब प्रविष्ट राजकार्य मन्त्रियों द्वारा प्रस्तुत हो रहे थे, चतुर वार्तावाहक
दूत देश की खबर सुना चुके थे, पवित्र महाभारत आदि इतिहासमय पुस्तक पढ़ी जा रही थी
ओर विनम्र बन्दीगण सामने पवित्र स्तुतिर्यो पढ रहे थे, जैसे मेघ, जिसने होनेवाली वृष्टि से
बिजली की चमक-दमक आदि आटोप को धारण किया है, पृथ्वी में प्रवेश करता है वैसे ही
किसी ऐन्द्रजालिक ने उस सभा में प्रवेश किया