Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 104, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
विरेजुर्विस्मयापूर्णा निःस्पन्दास्ते सभासदः ।
निःस्पन्दकिञ्जल्कदलाः पद्माः पङ्ककृता इव ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मिट्टी से
बने हुए निश्चल केसर और दलवाले कमल शोभित होते है वैसे ही विस्मयपूर्ण निश्चल वे सब
सभासद शोभित हुए