Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 104, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
बभूवुः केवलं तत्र निःस्पन्दसितचामराः ।
चामरिण्यो हि शर्वर्यः स्तम्भितेन्दुकरा इव ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
जिनमें
चन्द्रमा की किरणें स्तम्भित हों, ऐसी रात्रियों की नाई केवल वहाँ पर चँवर इलानेवाली महिलाएँ
निश्चल सफेद चँवरवाली हो गई यानी उन्होने चवर डुलाना बंद कर दिया