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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 104, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

बोधितः केनचिन्नासौ स्वप्रतापजितोर्जितः । धिया कामप्ययं भूयश्चिन्तां चिन्तयतीति च ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने पराक्रम से बलवानों पर जिसने विजय पायी थी, ऐसे उस राजा को किसी ने नहीं जगाया क्योकि वे सोचते थे ये किरी बड़ी भारी चिन्ता का अपनी बुद्धि से चिन्तन कर रहे हैं