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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verses 2–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 105, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

आसनात्साङ्गदोत्तंसः प्रबुद्धोऽसावकम्पयत् । सवनाभोगशृङ्गाग्र्यो भूकम्प इव पर्वतः ॥ २ ॥ बभूवाथ प्रबुद्धोऽसावासनोपरि कम्पितः । विक्षुब्ध इव पातालवारणे शङ्कराचलः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे भूकम्प के समय विशाल वन ओर शिखरो के अग्रभागो से युक्त पर्वत अपने शरीर को कँपाता है वैसे ही जाग कर बाजूबन्द और शिरोमालासे विभूषित राजा ने आसन से अपने शरीर को कैपाया । पाताल हस्ती के (पृथिवी को धारण करनेवाले दिग्गज के) क्षुब्ध होने पर जैसे हिमालय कम्पित होता है वैसे ही प्रबुद्ध होकर आसन के ऊपर वह कम्पित हुआ