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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 105, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

पतन्तं धारयामासुस्तं पुरोगा नृपं भुजैः । मेरुं प्रलयविक्षुब्धं कुलशैलास्तटैरिव ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे प्रलयकाल में क्षुब्ध हुए मेरु को कुलपर्वत अपने तटों से सम्हालते हैं वैसे ही गिर रहे उस राजा को सामने स्थित मन्त्री आदि ने अपनी भुजाओं से सम्हाला