Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 105, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अथोवाच सभा देव किमेतदिति सादरम् ।
रणन्मधुकरी भानुं दृष्टराहुमिवालिनी ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर जैसे राहू से ग्रस्त सूर्य से नलिनी, जिससे भ्रमरियाँ शब्द कर रही हों,
आदर के साथ आश्वासन वचन कहती हे वैसे ही सभा ने “हे देव, यह आप क्या कह रहे हे; यों
बड़े आदर के साथ राजा से कहा