Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 106, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
मह्यमोदनमाश्वेतद्बाले बलवदापदि ।
देहिदीनार्तिहरणात्स्फारतां यान्ति संपदः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर केवल “चीं चीं चूं चं "यों
चहचहा रहे पक्षी निशंक होकर निष्फल वनप्रदेश में परिभ्रमण से अपनी जाति चपलता प्रकट
करते हुए फुदक रहे थे । तदुपरान्त जब सूर्य आकाश के आठवें हिस्से में चढ़ चुके थे यानी
लगभग चार दण्ड दिन चढ़ गया था और लताएँ, जिनके ओसबिन्दु सूख गये थे, अतएव मालूम
होता था मानों स्नान कर चुकी हों, उस समय घूम रहे मैंने सिर पर भात का थाल रक्खी हुई
एक कन्या को देखा जैसे कि दानव ने अमृत के सुन्दर घड़े को धारण की हुई माधवी (मोहिनी
रूप धारण किये हुए भगवान) को देखा था। उसके नेत्रों की तारिका बड़ी चंचल थी, स्वरूप
काला ओर काले ही वस्त्र पहिने थी। जैसे चंचल सितारे रूपी नेत्रों से युक्त तथा अन्धकार
रूपी वस्त्रों को धारण करनेवाली काली रात्रि के पास चन्द्रमा जाता है वैसे ही वहाँ पर मैं उसके
समीप गया ॥ ३ ८-४ १॥ मैंने उससे कहा : हे बाले, इस भारी संकट में पड़े हुए (५६) मुझे शीघ्र
यह भात दो, दीन पुरुषों का दुःख हरने से सम्पत्तियाँ वृद्धि को प्राप्त होती है