Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 106, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
क्षुदन्तर्महतीयं मे बाले वृद्धिमुपेयुषी ।
\\xa0कृष्णसर्पा प्रसूतेव कोटरस्था जरद्रुमे ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे बाले,
जैसे पुराने पेड़ में खोखले में रहनेवाली व्याई (=) हुई काली साँपिन वृद्धि को प्राप्त होती है
४६ “जिस पुरुष के प्राणों पर संकट उपस्थित हुआ हो वह यदि जिस किसी से अन्न लेकर खाता है, तो जैसे
कमल के पत्ते को जल का स्पर्श नहीं होता वैसे ही उसको भी पाप का स्पर्श नहीं होता" इत्यर्थक स्मृति है ।
<न वह अपने अण्डों तक को खा जाती है । * प्रसूता" विशेषण भूख की अनुचित कारिता का द्योतन
करने के लिए है । जैसे व्याई हुई साँपिन अपने अण्डे तक को खा डालती है, भला इससे बढ़कर
अनौचित्य और क्या होगा ? वैसे ही भूख भी क्या-क्या अनौचित्य नहीं करा डालती है ?
वैसे ही मेरे पेट में यह प्राणान्तकारिणी भूख की ज्वाला वृद्धि को प्राप्त हुई है