Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verse 72
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 106, verse 72 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 72
संस्कृत श्लोक
सरभसमभितो विनेदुरत्र प्रसृतमहामदिरासवाः श्वपाकाः ।
हतपटुपटहा विलासवन्तः स्वयमिव दुष्कृतराशयो महान्तः ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
इस विवाहोत्सव में जिन्हें मदिरा और आसव का मद चढ़ा
था, खूब जोर से नगाड़े बजा रहे थे, ऐसे चण्डाल लोग नाच विलास करते हुए मूर्तिधारी
ब्रह्महत्या आदि पापराशियों के तुल्य बड़े वेग से मेरे चारों ओर भाँति-भाँति के शब्द
करते थे