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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

राजोवाच । बहुनात्र किमुक्तेन सोत्सवावर्जिताशयः । तदाप्रभृति तत्राहं संपन्नः पुष्टपुल्कसः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा ने कहा : हे सभासदों, इस विषय में मैं बहुत क्या कहूँ विविध उत्सवों से युक्त विवाह से मेरा चित्त वशीभूत था| तब से लेकर मैं वहाँ पर पूरा चण्डाल बन गया

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ छठा सर्ग समाप्त एक सौ सातवाँ सर्ग वहाँ पर पूरे साठ वर्ष तक निवास करते हुए राजा का चण्डालोचित कार्य से जीवनयापन वर्णन |