Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
यौकाकीर्णजरत्क्लिन्नगन्धिकौपीनवाससा ।
आश्वस्य धवलीकानां तले नीता घनाः समाः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जुँओं से भरे हुए, जीर्णशीर्ण, पसीने से तर अतएव दुर्गन्ध से युक्त कोपीनमात्र ही
मेरा एकमात्र वस्त्र था। इस प्रकार एकमात्र कौपीन धारण करनेवाले मैंने धवलीक नामक वृक्षों
के तले विश्राम लेकर अनेक वर्ष बिता दिये