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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

क्षौमानेकसमाक्षीणपटे चेण्डकधारिणा । काष्ठभारो वने व्यूढो यो मूर्तमिव दुष्कृतम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

तीसी की छाल से बने हुए अनेक वर्षो से काम में लाने के कारण जीर्ण-शीर्ण वस्त्र के ऊपर पिण्डी को (करडे, तिनके आदि से बनाई गई पिण्डी, जिसे सिर पर रखकर बोझ उठाया जाता है) धारण करनेवाले मैंने वन में लकड़ियाँ ढोई, जो मूर्तिमान्‌ दुष्कर्म के समान था