Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
कलत्रचिन्ताह्रतया धिया संदह्यमानया ।
दृष्टाः कष्टसमारम्भा दिशः प्रज्वलिता इव ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
कुटुम्ब के पालन की चिन्ता से नष्ट हुई
अतएव जल रही बुद्धि से मैंने जलती हुई दिशाओं के समान अनेक क्लेशकारी कार्यो को
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