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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verses 14–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

काले क्षयं गते रोहे कालाभ्रघनतां गते । असौहार्देन बन्धूनां कलहैश्चापि संततैः ॥ १४ ॥ सर्वत्र जातशङ्केन कलाभिमुखरार्भकैः । मया कृपणचित्तेन नीताः परगृहे समाः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

काले मेघों से निबिड़ता को प्राप्त हुए सब बीजों को अंकुरित करनेवाले वर्षाकाल के बन्धुओं के दुर्भव से और सदा होनेवाले कलहों से बीतने पर सब जगह शंका करनेवाले अतएव दुःखी चित्तवाले मैंने तोतली वाणी बोलनेवाले बालकों के साथ अनेकों वर्ष दूसरे चाण्डाल के घर में बिताये