Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verses 29–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verses 29–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
वर्षासु मुक्ताकणवद्धृता वानलविन्दवः ।
अजाजीमूतखण्डार्थं क्षुत्क्षुण्णक्षीणकुक्षिणा ॥ २९ ॥
कलत्रेण सहाटव्यां कृतः कलह आकुलः ।
वने रणितदन्तेन शीतकेकरचक्षुषा ॥ ३० ॥
मषीमलिनगात्रेण वेतालस्वजनायितम् ।
सरित्तीरेषु मत्स्यार्थं भ्रान्तं बडिशधारिणा ॥ ३१ ॥
कल्पे जगत्सुनाशार्थं कृतान्तेनेव पाशिना ।
पीतं बहूपवासेन सद्यःकृत्तमृगोरसः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
क्षुधा से पीड़ित और क्षीण उदरवाले मैंने मेघ के खण्ड के समान तुच्छ बकरे के मांस के टुकड़े
के लिए जंगल में अपने परिवार के साथ बड़ा भारी कलह किया