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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verses 33–37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verses 33–37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 33,34

संस्कृत श्लोक

तत्कालकोष्णं रुधिरं मातुः स्तनपयो यथा । श्मशानसंस्थितान्मत्तो रक्तरक्तान्मलाशिनः ॥ ३३ ॥ विद्रुता वनवेतालाश्चण्डिकाभिद्रुता इव । वागुरा विपिने व्युप्ता बन्धार्थं मृगपक्षिणाम् ॥ ३४ ॥ आशा इव विवृद्ध्यर्थं पुत्रदारकलत्रजाः । मया मायामयैर्लोकाः सूत्रजालमयैः खगाः ॥ ३५ ॥ जालैर्जर्जरता नीता दिशश्चासुकृतायुषा । तत्रापि दत्तः प्रसरो मनसो दुष्कृतोदये ॥ ३६ ॥ आशा प्रसारिता दूरं प्रावृषीव तरङ्गिणी । करभ्या इव सर्पेण विद्रुतं दूरतो धिया ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

वन में शीत से मेरे दाँत बजते थे और मारे जाड़े के मेरी आँखें तिरछी हो गई थी। मेरा शरीर स्याही से भी अधिक काला हो गया था। यह सब होने से मैं पिशाचों का सगा-सम्बन्धी बन गया था ॥ ३ ०॥ जैसे प्रलयकाल में जगत्‌ का भलीभाँति विनाश करने के लिए फाँस (फंदा) हाथ में लिए हुए काल घूमता है वैसे ही मैं मछलियों को मारने के लिए नदी के किनारे-किनारे बंसी लेकर घूमा ॥ ३ १॥ बहुत उपवास होने के कारण तुरन्त काटे हुए मृग के वक्षस्थल से तत्काल गरमा-गरम खून माता के स्तन के दूध के समान मैंने पिया ॥ ३ २॥ श्मशान में बैठे हुए खून से लथपथ तथा श्मशानभूमि में स्थित अपवित्र मांस, बलि आदि खानेवाले मुझसे वन के वेताल ऐसे भागे मानों वे चण्डिकाओं से भगाये गये हों । मैने वन में मृग और पक्षियों के बन्धन के लिए जाल ऐसे फैलाये जैसे कि लोग अपनी वृद्धि के लिए पुत्र, स्त्री, कुटुम्ब आदि की आशा का जाल फैलाते हैं