Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
दूरे त्यक्ता दया देहे भुजङ्गेनेव कंचुकम् ।
क्रौर्यं सुखेन संरम्भशरवर्षिं निनादि च ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
मैंने
अपने मायारूपी जालों से लोगों को और डोरे के जालों से पक्षियों को क्लेश पहुँचाया और
अपने पापमय जीवन से दिशाओं को दूषित किया ॥ ३ ५॥ ऐसे पापकर्म के रहते भी मेने पापाचरण
में ही मन लगाया और पापकर्म में ही आशा ऐसे बढ़ाई जैसे वर्षा ऋतु में नदियाँ बढ़ती हैं। जैसे
भालु (५) के श्वास से साँप दूर भाग जाता है वैसे ही सद्बुद्धि मुझसे दूर चली गई थी। जैसे
साँप केचुल का परित्याग कर देता है वैसे ही मैंने दया का परित्याग कर दिया था ॥ ३६, ३ ७॥
जैसे ग्रीष्म ऋतु के अन्त में आकाश वेग से वृष्टि करनेवाले एवं गर्जन-तर्जन करनेवाले काले
मेघ का अंगीकार करता है वैसे ही वेग से बाणों की वृष्टि करनेवाली एवं गर्जन करनेवाली
क्रूरता का मैंने अंगीकार किया