Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verses 39–42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verses 39–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 39 ,40
संस्कृत श्लोक
अङ्गीकृतं निदाघान्ते नभसेवासिताम्बुदः ।
विकासिन्यो क्षताः क्षारा दूरं परिहृता जनैः ॥ ३९ ॥
श्वभ्रेणेव कुमञ्जर्यश्चिरमूढा मयापदः ।
स्वकालकुलकोणासु नरकोद्दामभूमिषु ॥ ४० ॥
उप्ता दुष्कृतबीजानां मुष्टयो मोहवृष्टयः ।
वागुराभिर्मया विन्ध्यकन्दरस्थेन निर्दयम् ॥ ४१ ॥
भूतेष्विव कृतान्तेन मृगेषु परिवल्गितम् ।
चामरीकण्ठकुड्येषु विश्रान्तशिरसा मया ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
ही" जिनके क्षेत्रभेद का विभाग करनेवाला है ऐसी नारकी उत्कट भूमियों में मैंने पापरूपी बीजों
की मुद्ठियाँ बोई, जिन्हें मोह ही वर्षा के तुल्य बढ़ाता है