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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verses 43–46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verses 43–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 43-46

संस्कृत श्लोक

सुप्तमस्तविवेकेन शेषाङ्गेष्विव शौरिणा । विलोलचरणाम्बरया सरावोल्लासिधूम्रया ॥ ४३ ॥ मम तन्वा सनीहारविन्ध्यकच्छगुहायितम् । कृष्णदेहेन यौकाढ्याकन्थास्कन्धे मया चिरम् ॥ ४४ ॥ ग्रीष्मे सोढा चलद्भूता वराहेण यथोर्वरा । बहुशोऽहं वनोत्थाग्निनिर्दग्धप्राणिमण्डलः ॥ ४५ ॥ कल्पाग्निभुक्तजगतः कालस्यानुगतिं गतः । लोभिलिङ्गो यथा रोगमनर्थानिव दुर्ग्रहः । प्रसूतास्तत्र मे दारा दुःखान्यथ सुखान्यपि ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

विन्ध्याचल की गुफाओं में रहनेवाले मैंने जाल आदि मृगों को फँसाने के साधनों से मृगों पर अपना निर्दयतापूर्वक ऐसा पराक्रम दिखाया जैसा कि काल प्राणियों पर दर्शाता हे । जैसे श्रीविष्णु भगवान्‌ शेषनाग के शरीर पर शयन करते हैं वैसे ही मैं, जिसका विवेक नष्ट हो गया था, चामरी के कण्ठरूपी भीत पर सिर रख कर सोया ॥ ४ १,४२॥ चंचल चरण और वस्त्रवाले, तथा शब्दपूर्वक धूम जिसमें उल्लसित हो रहा है ऐसे मेरे शरीर ने, पक्षियों से जिसके समीपस्थ पर्वत और आकाश चंचल हो, गरजते हुए व्याघ्र आदि से जिसका रूप उल्लसित हो, ऐसे कुहरे से आच्छन्न विन्ध्याचल के जलमय प्रदेश की शोभा धारण की | जैसे भगवान्‌ वराह ने पृथिवी को, जिसमें असंख्य जीव चल रहे थे, सहा था यानी अपने ऊपर धारण किया था वैसे ही काले शरीरवाले मैंने ग्रीष्म ऋतु में जुँओं के झुँड से पूर्ण कन्था को बहुत दिनों तक अपने कन्धे पर सहा यानी धारण किया । बहुत बार मैंने वन में धधकती हुई अग्नि से बहुत से प्राणियों को भस्म कर डाला था, अतएव मेने जिसने प्रलय की अग्नि से जगत्‌ को खा डाला, उस काल का अनुकरण किया । जैसे स्तरीप्रसंग का व्यसनी पुरुष रोगों को उत्पन्न करता है अथवा जैसे दुष्ट ग्रह या दुराग्रह वेर, कलह आदि अनर्थो की सृष्टि करता हे वैसे ही मेरी पत्नी ने दुःख ओर सुख रूप बच्चों को उत्पन्न किया