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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 109, Verses 17–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 109, verses 17–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 109 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

सर्वदुःखापनोदाय स्नेहकारुण्यमोहिना । तस्य तामार्तिमालोक्य मया दुःखातिभारिणा ॥ १७ ॥ सोढुं तामापदं तीव्रामशक्तेन हतात्मना । मरणायातिमित्राय कृतोऽन्तर्निश्चयो मया ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

स्नेह और करुणा से मोह में पड़े हुए तथा अत्यन्त दुःखित हुए मैंने, जो कि उस तीव्र आपत्ति को सहने में समर्थ न था, बच्चे की उस पीड़ा को देखकर सब दुःखों से छुटकारा पाने के लिए और उस काल के योग्य सहत्‌ मरण के लिए मन में निश्चय किया