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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 109, Verses 28–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 109, verses 28–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 109 · श्लोक 28,29

संस्कृत श्लोक

न च शाम्बरिकेच्छेयं माया मनसि मोहिनी । अर्थस्य सिद्ध्यै चेहन्ते नित्यं शाम्बरिकाः किल ॥ २८ ॥ यत्नेन प्रार्थयन्तेऽर्थं नान्तर्धानं व्रजन्ति भो । इति संदेहवेलायां संस्थिता लुलिता वयम् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

एेन्द्रजालिक की इच्छा नहीं हे । यह मनमें मोह डालनेवाली माया है । एेन्द्रजालिक तो नित्य धन की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं उनका दूसरा कोई प्रयोजन नहीं होता । वे तो बड़े प्रयत्न से धन माँगते हैं, वे अदृश्य नहीं हो जाते । इन दो हेतुओं से सन्देहाकुल हम लोग सन्देहसागर के तटरूप निर्णय को प्राप्त हुए हैं