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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 109, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 109, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 109 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

देहावयवसंलीनपुत्रदाराग्र्यबन्धवः । शीर्णाः केचन तत्रैव च्छिन्ना इव वने द्रुमाः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे वन में काटे गये वृक्ष वहीं पर जीर्णशीर्ण हो जाते हैं वैसे ही कितने लोग, जो अपने पुत्र, स्त्री, श्रेष्ठ बन्धुओं को अपने शरीर के अवयवों की नाई छोड़ नहीं सकते थे, वहीं पर तहस-नहस हो गये