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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 109, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 109, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 109 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

भक्ताः केचन च व्याघ्रैर्निर्गतास्तु स्वमन्दिरात् । अजातपक्षकाः श्येनैः खगा नीडोद्गता इव ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे अपने घोंसले से निकले हुए पक्षियों को, जिनके पंख नहीं निकले हों, बाज खा जाते हैं, वैसे ही अपने घर से निकले हुए कितनों को बाघ, भालू आदि जंगली जानवर चट कर गये