Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 109, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 109, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 109 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
इति बहुकलनाविवर्धिताङ्गं जयति चिरं विततं मनो महात्मन् ।
शममुपगमिते परस्वभावे परममुपैष्यसि पावनं पदं यत् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महात्मन् इस प्रकार बहुत-
सी कल्पनाओं से बद्धमूल (जिसने अपने कलेवर की वृद्धि की है) अतएव फल, पल्लव ओर
शाखाओं से विस्तार को प्राप्त वृक्ष के समान मन आत्मा के स्वरूप को छिपाकर स्वयं
सर्वोत्कर्षं में स्थित हे । विचारजनित ज्ञान से मन को निवसिनिकतारूप शम को प्राप्त करा
देने से मन के आत्मस्वभाव होने पर भेदक उपाधि का बाध हो जाने से आप परम पवित्र
पद को प्राप्त हो जायेंगे