Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 11, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
अज्ञानमेव यद्भाति संविदाभासमेव तत् ।
यज्जगद्दृश्यते स्वप्ने संवित्कचनमेव तत् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि अज्ञान ही जगत् का परिणामी कारण है, फिर कारण के अभाव से यह
जगत् कार्य नहीं है, इस प्रकार पूर्व श्लोकरमे कारण का अभाव कैसे कहा ? इस पर कहते है ।
जो अज्ञान ही जगदाकार से परिणत होता है, यह कहा जाता है, उसका यह तात्पर्य नहीं
है कि जैसे दूधका परिणाम दही होता हे, वैसे अज्ञान का परिणाम जगत् है, बल्कि अज्ञान
संवित् को (ज्ञान को) ही जगत्रूप से दर्शाता है अर्थात् संवित्का ही जगत् के रूप से विवर्तं
कराता हे । अज्ञानका परिणाम संवित् का विवर्त ही है, यह बात स्वप्नमें प्रसिद्ध है, ऐसा कहते
हैं । स्वप्न मेँ जो जगत् (स्वाप्निक प्रपंच) दिखाई देता है, वह संवित् का विलास ही है ।
(संवित्का विवर्तं ही है), उससे अतिरिक्त नहीं है